मालदा: पश्चिम बंगाल में SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिव्यू) को लेकर फैले डर के बीच एक और बेहद दुखद घटना सामने आई है। मालदा जिले में दस्तावेज़ों की कमी और वोटर लिस्ट से नाम कटने की आशंका के चलते एक महिला ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली। यह घटना पुराने मालदा थाना क्षेत्र के कामंच इलाके की है। मृत महिला की पहचान बानोती राजबंशी (36 वर्ष) के रूप में हुई है, जो राजबंशी समुदाय से थीं।
परिवार और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, बानोती राजबंशी का जीवन शुरू से ही संघर्षों से भरा रहा। उनकी मां के गर्भ में रहते हुए ही एक दुर्घटना में उनके पिता गोपाल राजबंशी की मृत्यु हो गई थी। इसके तीन साल बाद उनकी मां का भी निधन हो गया। माता-पिता को बचपन में ही खो देने के कारण बानोती अपने दादा के घर पली-बढ़ीं। इस कारण उनके पास न तो माता-पिता के जन्म या मृत्यु प्रमाण पत्र थे और न ही स्वयं का जन्म प्रमाण पत्र कभी बन पाया।
बाद में बानोती की शादी सोमेज राजबंशी से हुई, जो पेशे से एक किसान हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर थी। इसी बीच हाल ही में वोटर लिस्ट से संबंधित SIR प्रक्रिया शुरू हुई, जिसमें कई तरह के दस्तावेज़ जमा करना अनिवार्य बताया गया। आरोप है कि बानोती के पास आधार कार्ड, वोटर कार्ड के अलावा जन्म प्रमाण पत्र और माता-पिता से जुड़े जरूरी कागजात उपलब्ध नहीं थे। इस कारण वह फॉर्म भरने में असमर्थ रहीं और गहरे मानसिक तनाव में चली गईं।
परिजनों का दावा है कि वोटर लिस्ट से नाम हट जाने और नागरिक पहचान खोने के डर ने बानोती को मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया था। इसी आशंका और भय के चलते बीते मंगलवार को उन्होंने ज़हर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की। हालत गंभीर होने पर पहले उन्हें स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया और बाद में मालदा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालांकि इलाज के दौरान बुधवार सुबह उनकी मौत हो गई।
घटना के बाद इलाके में शोक की लहर फैल गई है। पड़ोसियों का कहना है कि बानोती बेहद शांत स्वभाव की महिला थीं और किसी से झगड़ा नहीं करती थीं। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि वह ऐसा कठोर कदम उठा लेंगी। हालांकि परिवार की ओर से SIR के डर को मौत का कारण बताया जा रहा है, लेकिन इस संबंध में अभी तक पुराने मालदा थाने में कोई लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है।
इस घटना ने प्रशासनिक प्रक्रियाओं और दस्तावेज़ी जटिलताओं को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खासकर उन लोगों के लिए, जिनके पास जन्म से ही कोई आधिकारिक दस्तावेज़ नहीं हैं, क्या उनके लिए पर्याप्त मानवीय और वैकल्पिक व्यवस्था मौजूद है? मालदा की यह घटना न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि व्यवस्था की खामियों पर भी गहरी चिंता पैदा करती है।