पश्चिम बंगाल की राजनीति के वरिष्ठ नेता और तृणमूल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे Mukul Roy के निधन से राज्य की सियासत में शोक की लहर दौड़ गई है। उनके निधन की खबर सामने आते ही विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने गहरा दुख व्यक्त किया और उनके योगदान को याद किया।
तृणमूल कांग्रेस के नेता Kunal Ghosh ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने अपने संदेश में लिखा कि “मुकुल रॉय अब हमारे बीच नहीं रहे। उनकी आत्मा को शांति मिले।” साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी के कठिन दौर में मुकुल रॉय ने संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
श्रद्धांजलि के साथ पुराने मतभेदों का उल्लेख
कुणाल घोष ने अपने संदेश में सिर्फ शोक ही व्यक्त नहीं किया, बल्कि राजनीतिक जीवन के कुछ कटु अनुभवों का भी उल्लेख किया। उन्होंने संकेत दिया कि एक समय ऐसा भी था जब उनके और मुकुल रॉय के बीच मतभेद उभरे थे और उनके राजनीतिक करियर पर भी असर पड़ा था। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं और समय के साथ कई बातों को पीछे छोड़ देना ही बेहतर होता है।
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ निजी और राजनीतिक क्षण ऐसे रहे जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता। साथ काम करने के दिनों की कई यादें आज भी उनके मन में ताजा हैं।
तृणमूल से भाजपा और फिर वापसी
मुकुल रॉय लंबे समय तक All India Trinamool Congress के प्रमुख रणनीतिकारों में रहे। पार्टी के गठन से लेकर संगठन विस्तार तक उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। बाद में राजनीतिक मतभेदों के चलते उन्होंने Bharatiya Janata Party का दामन थामा, जिससे राज्य की राजनीति में हलचल मच गई थी।
हालांकि कुछ समय बाद उन्होंने फिर से तृणमूल कांग्रेस में वापसी की। उनके राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन वे हमेशा चर्चा के केंद्र में बने रहे।
राजनीतिक विरासत
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मुकुल रॉय संगठन निर्माण और चुनावी रणनीति के मामले में बेहद कुशल नेता थे। उन्होंने पश्चिम बंगाल की राजनीति में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। उनके फैसलों को लेकर विवाद भी हुए, लेकिन उनकी संगठन क्षमता और रणनीतिक सोच को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।
उनके निधन के बाद राजनीतिक गलियारों में शोक और आत्ममंथन का माहौल है। विभिन्न दलों के नेताओं ने उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की है और उनकी राजनीतिक यात्रा को याद किया है।
निष्कर्ष
मुकुल रॉय का जाना पश्चिम बंगाल की राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत माना जा रहा है। कुणाल घोष की श्रद्धांजलि में जहां सम्मान और भावनाएं झलकती हैं, वहीं राजनीतिक जीवन की जटिलताओं का भी उल्लेख है।
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