पश्चिम बंगाल की राजनीति के वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता मुकुल रॉय का निधन हो गया। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे रॉय ने रविवार देर रात कोलकाता के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही राज्य की राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की है।
मुकुल रॉय राज्य की राजनीति में एक मजबूत संगठनकर्ता और रणनीतिकार के रूप में पहचाने जाते थे। तृणमूल कांग्रेस के शुरुआती दौर से ही वे पार्टी के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे। संगठन को मजबूत करने और जमीनी स्तर पर विस्तार देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। लंबे समय तक वे पार्टी के भीतर बेहद प्रभावशाली नेता रहे और उन्हें कभी-कभी पार्टी का ‘दूसरा सबसे ताकतवर चेहरा’ भी कहा जाता था।
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के दौरान उन्होंने रेल मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली। प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक समझ के कारण राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पहचान बनी। उन्होंने संगठनात्मक रणनीति और चुनावी प्रबंधन में अपनी अलग छाप छोड़ी।
राजनीतिक जीवन में उतार-चढ़ाव भी आए। तृणमूल कांग्रेस छोड़कर वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और बाद में फिर राज्य की राजनीति में वापसी की। हालांकि स्वास्थ्य समस्याओं के कारण पिछले कुछ समय से वे सक्रिय राजनीति से दूर थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुकुल रॉय उन नेताओं में से थे जो पर्दे के पीछे रहकर भी बड़े फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता रखते थे। उम्मीदवार चयन से लेकर चुनावी रणनीति तक, कई महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी भूमिका रही।
उनके निधन पर शासक और विपक्षी दलों के नेताओं ने गहरा शोक व्यक्त किया है। कई नेताओं ने उन्हें एक अनुभवी, शांत स्वभाव और संगठन कौशल से परिपूर्ण राजनेता बताया। परिवार सूत्रों के अनुसार, अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शीघ्र ही संपन्न की जाएगी।
मुकुल रॉय का निधन केवल एक नेता की मृत्यु नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत है। आने वाले समय में उनके राजनीतिक योगदान और प्रभाव पर चर्चा जारी रहेगी।